11/10/2026
क्या आप भी इसे खरपतवार झाड़ी ही समझते हैं?
वर्षा ऋतु की पहली फुहार पड़ते ही इसके पौधे खुद उग आते हैं, और गर्मी के दिनों में जो-जो जगह सूखकर खाली हो जाती है, वह इसके पौधे से भरकर हरी-भरी हो जाती है। इसके पत्ते अठन्नी के आकार के और तीन जोड़े वाले होते हैं।
इस झाड़ी रूपी पौधें को पवाड़ कहते हैं। वर्षाकाल में पवाड़ का पौधा अपने आप सब तरफ पैदा हो जाता है। यह दो प्रकार का होता है। चक्र मर्द और कासमर्द। त्वचा पर दाद गोलाकार में होती है, अतः दाद को अंग्रेजी में रिंगवॉर्म कहते हैं। चक्र मर्द नाम का पौधा दाद के गोल-गोल घेरे चक्र को नष्ट करता है, इसीलिए इसे संस्कृत में चक्रमर्द यानी चक्र नष्ट करने वाला कहा गया है।
चक्रमर्द शब्द का अपभ्रंश नाम ही 'चकवड़' हो गया। इसके पत्ते मेथी के पत्तों जैसे होते हैं। इसी से मिलता-जुलता एक पौधा और होता है, जिसे कासमर्द या कसौंदी कहते हैं। यह पौधा चक्रमर्द से थोड़ा छोटा होता है और इसकी फलियाँ पतली व गोल होती हैं। यह खाँसी के लिए बहुत गुणकारी होता है, इसलिए इसे कासमर्द यानी कास खाँसी का शत्रु कहा गया है।
पवाड़ चक्रमर्द एक बेहद उपयोगी और औषधीय गुणों से भरपूर वर्षाकालीन वनस्पति है, जिसे आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसकी पहचान, नामकरण और स्वास्थ्य लाभों का संपूर्ण विवरण नीचे दिया गया है।
1) पवाड़ चक्रमर्द की पहचान और नामकरण
■ वैज्ञानिक नाम: Senna tora / Cassia tora
■ संस्कृत नाम: चक्रमर्द
■ विभिन्न भाषाओं एवं आंचलिक नाम:
◆ हिन्दी: पवाड़, पवाँर, चकवड़, तरोता
◆ छत्तीसगढ़ी: चिरौठा
◆ मराठी: टाकला
◆ गुजराती: कुवाड़ियों
◆ अंग्रेजी: ओवल-लीव्ड केशिया / फोएटिड केशिया
🔸 'चक्रमर्द' नाम क्यों पड़ा?
त्वचा पर होने वाला दाद आमतौर पर गोल-गोल घेरे में होता है जिसे अंग्रेजी में Ringworm कहा जाता है। यह पौधा दाद के उस गोल घेरे यानी चक्र को पूरी तरह नष्ट कर देता है, इसीलिए संस्कृत में इसे चक्रमर्द अर्थात चक्र को नष्ट करने वाला कहा गया है। इसी शब्द के अपभ्रंश से इसे 'चकवड़' कहा जाने लगा।
🔸 पौधे के लक्षण:
वर्षा ऋतु की पहली फुहार पड़ते ही इसके पौधे अपने आप उग आते हैं। इसके पत्ते मेथी के पत्तों के समान और अठन्नी सिक्के के आकार के तीन जोड़ों वाले होते हैं। इसकी फलियां पतली और गोल होती हैं।
2) पवाड़ के प्रमुख औषधीय लाभ एवं गुण
🔹 चर्म रोगों व दाद-खाज का इलाज: यह मुख्य रूप से भयंकर दाद, खाज, खुजली और एक्जिमा जैसे त्वचा रोगों को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध है। इसके बीजों को नींबू के रस या दही के साथ पीसकर लेप लगाने से दाद तेजी से ठीक होता है। इसकी पत्तियों और कंद के लेप में रोगाणुरोधक गुण होते हैं जो फोड़े-फुंसियों और मुहांसों में राहत देते हैं।
🔹 प्राकृतिक रक्त शोधक: इसके पत्तों का नियमित सेवन या चूर्ण का उपयोग शरीर के खून को साफ करता है, जिससे चेहरे पर चमक आती है और त्वचा के संक्रमण दूर होते हैं।
🔹 पेट के कीड़े और कब्ज: इसके पत्तों और कंद में हल्का जुलाब देने वाला और पाचन शक्ति बढ़ाने वाला गुण होता है। इसका काढ़ा पीने से आंतें साफ होती हैं, कब्ज दूर होता है और पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
🔹 सूजन और दर्द में राहत: इसके कंद व पत्तों में सूजन कम करने वाले गुण पाए जाते हैं। इन्हें पीसकर प्रभावित स्थान पर लगाने से जोड़ों के दर्द, गठिया और मांसपेशियों की सूजन में आराम मिलता है।
🔹 बवासीर में राहत: आयुर्वेद के अनुसार इसके कंद के उचित उपयोग से शरीर की अंदरूनी व बाहरी सूजन तथा बवासीर की समस्या में आराम मिलता है।
🔹 मधुमेह और इंसुलिन नियंत्रण: इसमें प्रचुर मात्रा में डाइटरी फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो रक्त में शर्करा के अवशोषण को धीमा करके डायबिटीज और चयापचय को संतुलित रखते हैं।
🔹 हृदय स्वास्थ्य और कोलेस्ट्रॉल: यह शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) के स्तर को कम करने में सहायक है, जिससे धमनियों की रुकावट और उच्च रक्तचाप का जोखिम कम होता है।
🔹 वजन प्रबंधन: इसमें कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट और फाइबर उच्च मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है और वजन नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
🔹 श्वसन संबंधी स्वास्थ्य: इसके सेवन से कफ विकार, खांसी और सांस से जुड़ी हल्की समस्याओं में राहत मिलती है।
🔹 कैंसर-रोधी गुण: इसमें मौजूद फ्लेवोनॉयड्स और प्राकृतिक यौगिक कोशिकाओं को फ्री-रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं।
🔹 महिलाओं का स्वास्थ्य: पारंपरिक आयुर्वेद में इसका उपयोग हार्मोनल असंतुलन और मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द व ऐंठन को कम करने के लिए किया जाता है।
🔹 पारंपरिक साग: ग्रामीण इलाकों में इसके कोमल और कच्चे पत्तों की स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है, जो मानसूनी बीमारियों से शरीर की रक्षा करती है।
⚠️ आवश्यक परामर्श एवं ध्यान रखने योग्य बातें
यद्यपि पवाड़ एक अत्यंत गुणकारी और दिव्य वनस्पति है, परंतु इसके औषधीय प्रयोग से पहले निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें।
● चिकित्सकीय सलाह: आंतरिक सेवन काढ़े, चूर्ण या रस के रूप में इसका उपयोग करने से पहले हमेशा किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक परामर्श अवश्य लें।
● मात्रा का ध्यान: इसमें स्वाभाविक रूप से हल्का रेचक जुलाब गुण होता है, इसलिए इसका अत्यधिक मात्रा में सेवन न करें।
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