28/09/2026
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*वेणुगीत 44, परम पूज्य श्रीभाईजी*
*राधा राधा राधा राधा राधा*
*पुस्तक : वेणुगीत*
*भाव-साधना (शेष)*
*सखी मञ्जरी का अंग-अंग एवं प्रत्येक वृत्ति यही चाहता है कि श्रीकृष्ण को सुख मिले। उनके चित्त की कोई भी वृत्ति किसी काल, किसी क्षण अथवा किसी अंश में भी निज-सुख की वाञ्छा नहीं करती। स्वसुख-परित्याग ही गोपी-भावका मूल है।*
*कृष्ण-प्रेम-रसिका है राधा, सखी सब उसके पल्लव, फूल।*
*लीलामृत से लता सींचते, जब हों कृष्ण परम अनुकूल ।।*
*राधा लता प्राप्त करतीं तब दिव्यानन्द स्वयं स्वच्छन्द ।*
*पातीं पत्र, पुष्प, मंजरियाँ उससे कोटि गुणा आनन्द ।।*
*वस्तुतः त्याग ही गोपांगनाओं का परम धन है, त्यागके मूल्य पर ही श्रीकृष्णधन उन्हें प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्ण से मिलकर एवं उनका वंशीनाद सुनकर, श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिका परमसुखी होती हैं। इसी उद्देश्य से ये सखी* *-मञ्जरियाँ भी श्रीकृष्ण की वेणु-माधुरी का वर्णन करती हैं। राधिकाजी सोचती हैं कि श्रीकृष्ण के वदन-माधुर्य का आस्वादन ही वेणु की सफलता है। सखी-मञ्जरियों के भाव को भी इसी श्लोक में शुकदेवजी ने छिपे-छिपे व्यक्त कर दिया है। श्रीमद्भागवत के प्रेमी टीकाकारों ने इसे देख-समझकर दूसरे भाव से इसका अर्थ किया है। 'अक्षण्वतां फलमिदम' इसमें राधाभाव और सखी-मञ्जरियों के भावोंका भी संकेत है। श्रीकृष्णके वंशीनाद को श्रवण करके श्रीराधिका की सखी-मञ्जरियों ने भी वहाँ श्रीराधा माधवकी युगल-माधुरी का दर्शन करनेकी लालसा से अपनी सखी-मञ्जरियों से कहा- 'सखी ! ब्रजेशसुत श्रीकृष्ण और व्रजेश-सुता श्रीराधिका जी जब परस्पर मिलित होकर परस्पर के कैशोर-वयोचित वेश-रचना करते हैं, उस समय उनके मुख की शोभा निराली होती है। मोहन के मुरली परिचुम्बित और राधिका के दृष्टि-कटाक्ष-परिसेवित तथा निज जनोंके प्रति स्निग्ध-दृष्टि-सम्वलित वदन की शोभा जिन नेत्रों ने देखी है, वे धन्य हैं। पर सखी-मञ्जरियों के लिये तो राधा-माधव की सेवा ही उनका सुख है। श्रीकृष्ण और राधिका माधव और राधा-व्रजेशसुत और व्रजेशसुता- इन दोनोंका जो सम्मिलित कैशोर-वयोचित वेश-रचना एवं लीला-विहार है, उसमें रत जो मुरली-सुधा-परिचुम्बित और स्निग्धकटाक्षपातसमन्वित मुख-कमल है, उसे जिन नेत्रों ने देखा, वे सफल हैं, शेष असफल हैं। यही नेत्रों का फल है। ये गोपांगनाएँ केवल परम त्यागसे ही परम सुखका अनुभव करती हैं। इन पूर्वरागवती श्रीव्रजरमणियों ने ज्यों ही श्रीवंशी-नाद को श्रवण किया त्यों ही ये भाव-विकार से ग्रस्त हो गयीं और श्रीकृष्ण के मिलनकी परमदिव्य पवित्रतम परमपावनी लालसा से संयुक्त हो गयीं तथा अपनी-अपनी सखियों से संकेत के द्वारा श्रीकृष्ण की मुरली-माधुरीका वर्णन करने लगीं। वे सभी वास्तव में श्रीकृष्ण-गतप्राणा और श्रीकृष्णानुरागिणी हैं। उनके भाव अलग-अलग हैं और अपने-अपने भावोंके अनुसार ही उनमें श्रीकृष्ण के दर्शन की उत्कण्ठा-श्रीकृष्ण के मिलन की लालसा है। जैसे भावोंमें तारतम्य है, इसी प्रकार इस लालसा में भी तारतम्य है। असंख्य व्रज-रमणियों के भावों का वर्णन करने का शुकदेवजी को यहाँ अवकाश नहीं उन्हें तो सात दिनों में सारा-का-सारा श्रीमद्भागवत का प्रसंग पूर्ण करना है। परीक्षित् के सामने तो वे संक्षेपमें संकेत से ही सब कह देते हैं। रासपञ्चाध्यायी में इन श्रीगोपांगनाओं के विभिन्न भावोंका कुछ संकेत स्पष्टरूप से दिया गया है। श्रीकृष्ण-प्रेयसी सभी श्रीगोपांगनाएँ वास्तव में भाव-समुद्र हैं। समुद्र में कितनी प्रकार की ऊँची-नीची तरंगें उठती हैं, उनकी कोई गणना नहीं कर सकता। जैसे समुद्रकी ऊँची-नीची, उछलती हुई, मन्दगति से चलती हुई लहरियों की कोई गणना नहीं, उसी प्रकार श्रीगोपांगनाओं के भावोंकी भी कोई गणना नहीं है। उनकी कृपासे जिसमें इन भावोंकी जितनी स्फूर्ति हो जाती है, वही श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण के माधुर्यरूपी रसके समुद्र में इनका चित्त सदा ही निमग्न रहता है। वे सभी सदैव श्रीकृष्ण-स्मरण करती हैं। गोपियोंके भाव एवं उनके प्रेमका स्वरूप एक सूत्रमें- (तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलता') कहकर नारदजी ने बताया है। वे श्रीश्यामसुन्दर के प्रति समर्पित हैं। केवल स्मरण ही उनके पास बचा है। कभी क्षणभरके लिये विस्मरण होता है तो उनको परम व्याकुलता होती है। वे नित्य-निरन्तर श्रीकृष्णस्मरण, श्रीकृष्णध्यान, श्रीकृष्ण-गुण-लीला-चिन्तन, गुणलीला आलाप में लगी रहती हैं, इसलिये यह उनके लिये कोई नयी बात नहीं है। गोपियोंने श्रीकृष्ण-बलरामको 'व्रजेशसुत' कहकर जो नाम लिया, उसमें भाव-गोपन करनेकी चेष्टा की, परंतु इसमें भी वेणु की बात तो आ ही गयी। प्रेममें भाव-गोपन आवश्यक होता है, अतः उन्हें इस भाव को भी छिपाना इष्ट है। गोपियाँ दोनों भाइयोंके सौन्दर्य का स्पष्ट वर्णन करती हैं, जिससे आत्मगोपन ठीक हो जाय।*
*क्रमशः*