Krishna Bhakti Ras

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Krishna Bhakti Ras Krishna and His Beloved Radhe are sweet ! Experience Their amazing love by joining us in our journey Krishna Bhakti is the sweetest experience! Jai Radhe!

To stir this Bhakti in our hearts we need to hear and see the Form of the Lord, His Name, His pastimes and His Dham! As our Bhakti increases, Krishna Himself feels attracted to us, and it is He who comes closer to us . We move one step, and He moves 100 steps! On this page, I shall present the many aspects and facets of Krishna, each one sweeter than the other. I shall share my realizations, I shall share Krishna Kathas, and at times I shall share my own experiences too. I am 62 years old, Indian body, and my Ishta Dev has been, and will always be, Sri Krishna, but I have always approached Him through Mother Radha. She is a sweet and loving Mother…and She has tolerantly shown me the way over the years. I am also grateful to my parents and to my Gurudev for their love, patience and guidance since I was a child. If the pinnacle of Bhakti is a one hundred storey building, I am only on the first step of the first storey and I am not saying this just to be humble or polite. Having said that, I have felt so much joy that I told myself if there is this much joy just in the first step, then I would love to climb the floors faster and faster so I can experience the greater joy that is waiting! So please stay with me, interact with me……….and let us travel on this road together . I would like to dedicate this page to my Pujya Gurudev, without whom I am nothing! Jai Krishna! Jai Vrindavan!

*आज की श्रीराधा रानी की शयन आरती, तथा परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 10 🌹जय जय श्रीराधे🌹🙏🌹* बंदौं राधा-पद-रज पावन...
28/09/2026

*आज की श्रीराधा रानी की शयन आरती, तथा परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 10 🌹जय जय श्रीराधे🌹🙏🌹*

बंदौं राधा-पद-रज पावन।
स्याम-सुसेवित, परम पुन्यमय, त्रिबिध ताप बिनसावन॥

अनुपम परम, अपरिमित महिमा, सुर-मुनि-मन तरसावन।
सर्बाकर्षक रसिक कृष्नघन दुर्लभ सहज मिलावन॥

Episode 135श्री राधे। श्री हरिवंश। श्री डोंगरे जी महाराज की भागवतम्। Pujya Donreji Maharaj Sreemad Bhagwatam mein Raja B...
28/09/2026

Episode 135

श्री राधे।
श्री हरिवंश।
श्री डोंगरे जी महाराज की भागवतम्।

Pujya Donreji Maharaj Sreemad Bhagwatam mein Raja Bharat ki katha ko aage le jaa rahe hain.
Bharat ji ne rajya chhoda tha aur van mein aa gaye the. Weh prabhu ki maansik, yaani ke mann se seva kar rahe the aur bahut tanmay ho gaye the, unhe aanand aa raha tha.
Agar maansik seva karte karte thak jaate toh dhyan aur kirtan karne lagte.
Ek din Bharat Ji niyam anusar kamar tak jal mein khade huye the. Uss samay ek garbh wati hirni jal paan karne aayi.
Itne mein kahin se singh ne garjana ki, jis se vaha hirni bhay bheet ho gayi. Usne socha ke main nadi paar kar doon. Usne zor se chhalang maari.
Jaise hi usne chhalang maari hiran ke bache ka janma ho gaya aur vaha nadi ke jal mein gir pada.
Hirni doosre kinari toh pahunchi lekin uski wahan hi mrityu ho gayi.
Bharat ji ne uss mrig baalak ko nadi ke jal mein pada hua dekha aur uss mein bhi Sri Hari ka Darshan kiya..kyu ki Bharat Ji toh sab mein Hari hi dekhte the.
Veh sochne lage ki iss ki mata ki to mrityu ho gayi, so jagat mein iska toh koyi nahin raha hai. ab iska paalan aur iski Raksha koun karega?
Bharat Ji ko dayaa aayi aur woh uss hirni ke bache ko apne ashram mein le aaye.
Unhone socha ab yeh bacha mere sivay kisse bhi nahin pahachanta hai toh iska laalan paalan karna mera dharm hai.
Mein isse chhod doon toh yaha mar jayega.
Sri Dongreji kahate hain ke jeev maanta hai ke main doosron ki Raksha karta hoon.arre!!!! tu kya Raksha karega? Tumhe bhi toh ek din kaal le jaayega.
Karta harta toh Sri Hari hi hai na?
Tum ghar mein raho ya van mein, tumhara rakshak Sri Hari hi hai!
Dongreji Bhagwatam ke saatven skandh se ek shlok suna rahe hain:
Yadi Parmeshwar ki kripa ho toh jo anath ho ya van vasi ho toh bhi vaha jeevit rahata hai, aur Parmeshwar dwara maara gaya jeev ghar mein suraksh*t hone par bhi jeevit nahin rahata.
Dongreji kahate hain ke Mrig balak ko paani se bahar nikalne ka toh bharatji ka dharm tha.
Parantu unhone rakshak pita ban ne ka jo rishta jod liya vah achha nahin kiya.
Sab jeevon ka rakshak pita toh ek Ishwar hi hain.
Bharat ji ne apne aap ko mrig ka rakshak bana diya aur aise dosh abhimaan ke karan hi utpann hote hain.
Bharatji uss mrig ka laaalan paalan karne lage. Dheere dheere vaha bada hone laga.
Bharatji usse apni godh mein bithate aur uss se khelte the.
Bharat Jeevan ne apne bachhon ka laalan paalan bhi kiya tha kuch varsh pehele..yaha sanskar phir jaagrit hua.
Purane sanskaron ko bhoolna bada kathin hai.
Bharat ji ka mann uss hiran ke bacche mein phans gaya.
Ab unka mann prabhu bhajan mein sthir nahin ho paata tha.
Vaasna ka Vishay to badal gaya kintu vaasna toh mann mein raha gayi.
Sirf ghar chhodne se kuch nahin hota. Gyani purush toh apne mann ko vash mein karta hai.
Sri Dongreji kahate hain ke bharat ji ne mrig ko apne ashram mein rakha, wahan tak samajh lo theek kiya..kintu usse jo mann mein bhi rakha, man mein jaga de di.vaha theek nahin kiya.
Dongreji kahate hain sansar chhodkar kahan jaoge? Jahan bhi jao, sansar ko apne mann mein se dheere dheer hata do.
Sansar ko kabhi mann mein jaga mat do.
Mann mein ya toh kaam ko hi rakho ya phir Ishwar ko hi.
Donon saath saath nahin raha payenge.
Jai Sri Radhe.

🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *वेणुगीत 44, परम पूज्य श्रीभाईजी*  *राधा राधा राधा राधा राधा**पुस्तक : वेणुगीत**भाव-साधना (शेष)* *सखी मञ्जरी का अ...
28/09/2026

🌹🌹🌹🌹🌹🌹

*वेणुगीत 44, परम पूज्य श्रीभाईजी*

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*पुस्तक : वेणुगीत*

*भाव-साधना (शेष)*

*सखी मञ्जरी का अंग-अंग एवं प्रत्येक वृत्ति यही चाहता है कि श्रीकृष्ण को सुख मिले। उनके चित्त की कोई भी वृत्ति किसी काल, किसी क्षण अथवा किसी अंश में भी निज-सुख की वाञ्छा नहीं करती। स्वसुख-परित्याग ही गोपी-भावका मूल है।*

*कृष्ण-प्रेम-रसिका है राधा, सखी सब उसके पल्लव, फूल।*
*लीलामृत से लता सींचते, जब हों कृष्ण परम अनुकूल ।।*

*राधा लता प्राप्त करतीं तब दिव्यानन्द स्वयं स्वच्छन्द ।*
*पातीं पत्र, पुष्प, मंजरियाँ उससे कोटि गुणा आनन्द ।।*

*वस्तुतः त्याग ही गोपांगनाओं का परम धन है, त्यागके मूल्य पर ही श्रीकृष्णधन उन्हें प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्ण से मिलकर एवं उनका वंशीनाद सुनकर, श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिका परमसुखी होती हैं। इसी उद्देश्य से ये सखी* *-मञ्जरियाँ भी श्रीकृष्ण की वेणु-माधुरी का वर्णन करती हैं। राधिकाजी सोचती हैं कि श्रीकृष्ण के वदन-माधुर्य का आस्वादन ही वेणु की सफलता है। सखी-मञ्जरियों के भाव को भी इसी श्लोक में शुकदेवजी ने छिपे-छिपे व्यक्त कर दिया है। श्रीमद्भागवत के प्रेमी टीकाकारों ने इसे देख-समझकर दूसरे भाव से इसका अर्थ किया है। 'अक्षण्वतां फलमिदम' इसमें राधाभाव और सखी-मञ्जरियों के भावोंका भी संकेत है। श्रीकृष्णके वंशीनाद को श्रवण करके श्रीराधिका की सखी-मञ्जरियों ने भी वहाँ श्रीराधा माधवकी युगल-माधुरी का दर्शन करनेकी लालसा से अपनी सखी-मञ्जरियों से कहा- 'सखी ! ब्रजेशसुत श्रीकृष्ण और व्रजेश-सुता श्रीराधिका जी जब परस्पर मिलित होकर परस्पर के कैशोर-वयोचित वेश-रचना करते हैं, उस समय उनके मुख की शोभा निराली होती है। मोहन के मुरली परिचुम्बित और राधिका के दृष्टि-कटाक्ष-परिसेवित तथा निज जनोंके प्रति स्निग्ध-दृष्टि-सम्वलित वदन की शोभा जिन नेत्रों ने देखी है, वे धन्य हैं। पर सखी-मञ्जरियों के लिये तो राधा-माधव की सेवा ही उनका सुख है। श्रीकृष्ण और राधिका माधव और राधा-व्रजेशसुत और व्रजेशसुता- इन दोनोंका जो सम्मिलित कैशोर-वयोचित वेश-रचना एवं लीला-विहार है, उसमें रत जो मुरली-सुधा-परिचुम्बित और स्निग्धकटाक्षपातसमन्वित मुख-कमल है, उसे जिन नेत्रों ने देखा, वे सफल हैं, शेष असफल हैं। यही नेत्रों का फल है। ये गोपांगनाएँ केवल परम त्यागसे ही परम सुखका अनुभव करती हैं। इन पूर्वरागवती श्रीव्रजरमणियों ने ज्यों ही श्रीवंशी-नाद को श्रवण किया त्यों ही ये भाव-विकार से ग्रस्त हो गयीं और श्रीकृष्ण के मिलनकी परमदिव्य पवित्रतम परमपावनी लालसा से संयुक्त हो गयीं तथा अपनी-अपनी सखियों से संकेत के द्वारा श्रीकृष्ण की मुरली-माधुरीका वर्णन करने लगीं। वे सभी वास्तव में श्रीकृष्ण-गतप्राणा और श्रीकृष्णानुरागिणी हैं। उनके भाव अलग-अलग हैं और अपने-अपने भावोंके अनुसार ही उनमें श्रीकृष्ण के दर्शन की उत्कण्ठा-श्रीकृष्ण के मिलन की लालसा है। जैसे भावोंमें तारतम्य है, इसी प्रकार इस लालसा में भी तारतम्य है। असंख्य व्रज-रमणियों के भावों का वर्णन करने का शुकदेवजी को यहाँ अवकाश नहीं उन्हें तो सात दिनों में सारा-का-सारा श्रीम‌द्भागवत का प्रसंग पूर्ण करना है। परीक्षित् के सामने तो वे संक्षेपमें संकेत से ही सब कह देते हैं। रासपञ्चाध्यायी में इन श्रीगोपांगनाओं के विभिन्न भावोंका कुछ संकेत स्पष्टरूप से दिया गया है। श्रीकृष्ण-प्रेयसी सभी श्रीगोपांगनाएँ वास्तव में भाव-समुद्र हैं। समुद्र में कितनी प्रकार की ऊँची-नीची तरंगें उठती हैं, उनकी कोई गणना नहीं कर सकता। जैसे समुद्रकी ऊँची-नीची, उछलती हुई, मन्दगति से चलती हुई लहरियों की कोई गणना नहीं, उसी प्रकार श्रीगोपांगनाओं के भावोंकी भी कोई गणना नहीं है। उनकी कृपासे जिसमें इन भावोंकी जितनी स्फूर्ति हो जाती है, वही श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण के माधुर्यरूपी रसके समुद्र में इनका चित्त सदा ही निमग्न रहता है। वे सभी सदैव श्रीकृष्ण-स्मरण करती हैं। गोपियोंके भाव एवं उनके प्रेमका स्वरूप एक सूत्रमें- (तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलता') कहकर नारदजी ने बताया है। वे श्रीश्यामसुन्दर के प्रति समर्पित हैं। केवल स्मरण ही उनके पास बचा है। कभी क्षणभरके लिये विस्मरण होता है तो उनको परम व्याकुलता होती है। वे नित्य-निरन्तर श्रीकृष्णस्मरण, श्रीकृष्णध्यान, श्रीकृष्ण-गुण-लीला-चिन्तन, गुणलीला आलाप में लगी रहती हैं, इसलिये यह उनके लिये कोई नयी बात नहीं है। गोपियोंने श्रीकृष्ण-बलरामको 'व्रजेशसुत' कहकर जो नाम लिया, उसमें भाव-गोपन करनेकी चेष्टा की, परंतु इसमें भी वेणु की बात तो आ ही गयी। प्रेममें भाव-गोपन आवश्यक होता है, अतः उन्हें इस भाव को भी छिपाना इष्ट है। गोपियाँ दोनों भाइयोंके सौन्दर्य का स्पष्ट वर्णन करती हैं, जिससे आत्मगोपन ठीक हो जाय।*

*क्रमशः*

🦚🪷🌷🙏🌹🪷🦚*युगल सरकारकी जय!**सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती !* *देखी मैं आज मग में, कुंजन सों आवती !!**अंग अंग देत शोभा,...
28/09/2026

🦚🪷🌷🙏🌹🪷🦚
*युगल सरकारकी जय!*

*सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती !*
*देखी मैं आज मग में, कुंजन सों आवती !!*
*अंग अंग देत शोभा,भूषण जड़ाऊ आली!*
*नयननमें सोहै काजर,अधरन पै पान लाली !!*

*प्रीतम के कांधे कर धर, प्यारी अनन्द सों !*
*हँसि हँसि के करत बातें,मुख ललित चन्दसों !!*
*पग धरत हौंलें हौंलें, गति देख हंस लाजैं !*
*नूपुर परम मनोहर, अति मधुर मधुर बाजैं!!*

*या भाँति सों मगन है क्रीड़ा करत हैं दोऊ !*
*नारायण रसिकजन बिन,ये रस न जाने कोऊ!!*

भावार्थ:-
🌷💐 आज मार्ग में मैंने देखा कि श्री राधाकृष्ण युगल कुञ्ज से आ रहे हैं, जिनकी छबि अति सुन्दर एवं अनुपम है,जो मेरे ह्रदय को बहुत भाती है । श्री श्यामाश्याम के अंगों में विराजमान आभूषण उनकी शोभा में वृद्धि कर रहे हैं, उनके नेत्रों में काजल शोभायमान है और अधर पान की लाली से अरुण हैं । श्री राधा, प्रियतम श्री कृष्ण के कंधे पर हाथ धरकर बड़े आनंद से हंस-हंस कर उनसे बातें कर रही हैं,उनके मुख की उज्ज्वलता चंद्र के समान है । वे बड़े धीरे-धीरे पग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनकी गति देखकर हंस भी लज्जित हो रहा है। चरणों में विराजमान सुन्दर नूपुर अति मधुर ध्वनि कर रहे हैं। इस प्रकार श्री श्यामाश्याम युगल, प्रसन्न मग्न क्रीड़ा कर रहे हैं।
*श्री नारायण स्वामी कहते हैं "रसिकों के संग के बिना यह दुर्लभ दिव्य रस कोई नहीं जान सकता।"*
🙏🌹🪷🌷🪷🌹🙏

*लाड़िली ललचत है मन मेरो।**अविचल वास बसूँ बरसाने, नित निरखूं मुख तेरो॥**सेवा करूं कृपानिधि तेरी, रहूं चरण के नेरो।**सरस ...
28/09/2026

*लाड़िली ललचत है मन मेरो।*
*अविचल वास बसूँ बरसाने, नित निरखूं मुख तेरो॥*
*सेवा करूं कृपानिधि तेरी, रहूं चरण के नेरो।*
*सरस माधुरी छवि अवलोकूं, करों आपनों चेरो॥*

*हे लाड़िली श्री राधे! मेरा मन आपके लिए ललच रहा है, तरस रहा है। मेरी एक ही अभिलाषा है कि मुझे बरसाने में अविचल, स्थायी वास मिल जाए, जिससे मैं नित्य निरंतर आपके मुखारविंद का दर्शन करता रहूँ।*

*कृपानिधि! मैं नित्य आपकी सेवा करूँ और आपके चरणों के समीप ही रहूँ। आपकी सरस, माधुर्य से भरी मनोहर छवि का अवलोकन करता रहूँ और आप मुझे अपना चेरा (दासी) बना लें।*

🙏🪷🪷🪷🪷🪷🙏

*परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 650, श्रीराधा के प्रेमोद्गार, श्रीकृष्ण के प्रति। जय जय श्री राधे🌹🙏🌹* प्रियतम ! म...
28/09/2026

*परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 650, श्रीराधा के प्रेमोद्गार, श्रीकृष्ण के प्रति। जय जय श्री राधे🌹🙏🌹*

प्रियतम ! मीठी नित याद तुम्हारी आती।
मैं पलभर तुमको कभी बिसार न पाती॥

जगनेमें सपनेमें तुम, मेरे प्यारे, हो होते कभी न मुझसे पलभर न्यारे॥

दे दर्शन मुझको सदा परम सुख देते।
कर मीठी रसकी बातें, दुख हर लेते॥

देते रहते दिन-रात स्पर्श-सुख भारी।
निज हृदय खोल, कह देते मनकी सारी॥

यों मिलनेपर भी मिलनेकी अभिलाषा।
रहती बढ़ती ही नित्य मिलनकी आशा॥

नित मिलनेपर भी पल न दूर स्मृति होती।
वह सदा तुम्हींमें प्यारे !
जगती-सोती॥

*🌹🌹🌹परम पूज्य श्रीभाईजी के ""राधा माधव चिंतन ग्रंथ"" से दिव्य भाव।🌹* *राधा राधा राधा राधा राधा* *🌹श्रीराधा माधव चितंन ग्...
27/09/2026

*🌹🌹🌹परम पूज्य श्रीभाईजी के ""राधा माधव चिंतन ग्रंथ"" से दिव्य भाव।🌹*

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹श्रीराधा माधव चितंन ग्रंथ - (भाग 185)*

*🌹श्रीराधामाधव का दिव्य स्वरूप (भाग 12)*

*1969 (अर्थात् सं. 2026 वि.) के श्रीराधाष्टमी-महोतसव पर प्रवचन*

*🌹राधा-गोपी-प्रेम मधुर पावन का यह संदेश उदार ।*
*दुर्लभ जो अति मधुर-सुधा-भगवद् रस का शुचि पारावार ।।*
*मानव-जीवन का हो यह, बस, एकमात्र शुभ लक्ष्य पवित्र ।*
*शुद्ध प्रेम-रस-सागर में निमग्न रहना संतत सर्वत्र ।।*
*राधाष्टमी-महोत्सव का है केवल यही लाभ अति श्रेष्ठ ।*
*एकमात्र श्रीराधामाधव बन जायें जीवन के प्रेष्ठ ।।*

*🌹इस प्रेम की प्राप्ति के लिये हमें क्या करना चाहिये?*

*🌹🌹🌹यह पवित्र भगवत्प्रेम ही जीवन का परम लक्ष्य है- जो यह मानकर अपना जीवन बनाता है, वही वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य है।*

🌹भोगों में आसक्त, अशान्त तथा पाप जीवन मनुष्य से तो कर्म के अनधिकारी पशु आदि भी श्रेष्ठ हैं। अतएव इस लक्ष्य को सामने रखकर, इसके लिये दृढ़ संकल्प करके मानव को सतत प्रयत्नशील होना चाहिये। नीचे लिखे कुछ साधन इसमें सहायक और लाभप्रद हो सकते हैं-

🌹1. *भगवत्प्रेम* को ही जीवन का एकमात्र *परम उद्देश्य* समझना और इसे हर हालत में निरन्तर लक्ष्य में रखकर ही सब काम करना।

🌹2. जहाँ तक बने, सहज ही स्वरूपतः भोग-त्याग तथा भोगासक्ति का त्याग करना। जगत के किसी भी प्राणी-पदार्थ-परिस्थिति में राग न रखना।

🌹3. अभिमान, मद, गर्व आदि को तनिक-सा भी आश्रय न देकर सदा अपने को अकिंचन, भगवान के सामने दीनातिदीन मानना।

🌹4. कहीं भी ममता न रखकर सारी ममता एकमात्र भगवान प्रियतम श्रीकृष्ण के चरणों में केन्द्रित कर देना।

🌹5. जगत के सारे कार्य उन भगवान की चरण-सेवा के भाव से ही करना।

🌹6. किसी भी प्राणी में द्वेष-द्रोह न रखकर, सब में श्रीराधा-माधव की अभिव्यक्ति मानकर सबके साथ विनय का, यथासाध्य उनके सुख-हित-सम्पादन का बर्ताव करना। सबका सम्मान करना, पर स्वयं कभी मान न चाहना, न कभी स्वीकार करना।

🌹7. जगत का स्मरण छोड़कर नित्य-निरन्तर भगवान के स्वरूप, नाम, लीला आदि का प्रेम के साथ स्मरण करना।

🌹8.प्रतिदिन नियत संख्या में, जितना जो सुविधापूर्वक कर सकें-

*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।*
*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।*

या पहले ‘हरे कृष्ण’ से शुरू करके जप करना। दिनभर इस सोलह नाम के मन्त्र को रटते रहना। सुविधा हो तो कुछ समय तक इसी का कीर्तन करना।

*🌹🌹🌹परम पूज्य श्रीभाईजी के ""राधा माधव चिंतन ग्रंथ"" से दिव्य भाव।🌹* *राधा राधा राधा राधा राधा* *🌹श्रीराधा माधव चितंन ग्...
27/09/2026

*🌹🌹🌹परम पूज्य श्रीभाईजी के ""राधा माधव चिंतन ग्रंथ"" से दिव्य भाव।🌹*

*राधा राधा राधा राधा राधा*

*🌹श्रीराधा माधव चितंन ग्रंथ - (भाग 184)*

*🌹श्रीराधामाधव का दिव्य स्वरूप (भाग 11)*

*1969 (अर्थात् सं. 2026 वि.) के श्रीराधाष्टमी-महोतसव पर प्रवचन*

🌹यदि वास्तव में मनुष्य यथार्थ सुख चाहता हो तो उसके लिये यही एकमात्र परम साधन है और यही साध्य भी है।

गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में-

*सब कर मत बगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।।*
*साधन सिद्धि राम पग नेहु।*
*🌹🌹चहौं न सुगति, सुमति सम्पति कछु, रिधि-सिधि, बिपुल बड़ाई।*
*हेतुरहित अनुराग राम पद बढ़ौ अनुदिन अधिकाई।।*

*🌹🌹🌹शुद्ध प्रेम की झाँकी*

*शुद्ध प्रेम राधा राधव का सहज मिटा देता सब चाह।*
*रहती नहीं मोक्ष-सुख-इच्छा, नहीं नरक-दुख की परवाह।।*
*भोग-कामना, निज-इन्द्रिय-सुख की न वासना रहती शेष।*
*हो जाते युग-युग के सारे दुःखप्रद अभाव निःशेष।।*
*मिट जाते मद-मान-गर्व-ममता-आसक्ति, ईरषा-डाह।*
*छा जाते मन त्याग-प्रेम-आनन्द, नहीं रहता उर-दाह।।*
*लाभ-हानि, सुख-दुःख, शुभाशुभ का रहा पाता नहीं विवेक।*
*एकमात्र प्रियतम-सुख ही जीवन-स्वभाव-जीवन की टेक।।*
*सहज समर्पण हो जाता सब रहता नहीं किंतु वह याद।*
*कहीं तनिक अभिमान न रहता, होता प्रकट दैन्य अविवाद।।*
*पाता वह अनन्त सुख अनुपम प्रियतम को लख सुखी अगाध।*
*बार-बार सुख देने की बढ़ती परंतु उसके मन साध।।*
*त्याग बिना न कभी हो पाता प्रेमराज्य में तनिक प्रवेश।*
*भुक्ति-मुक्ति, निजसुख-इच्छा का रहता नहीं तनिक-सा लेश।।*

*तब भगवान स्वयं बन जाते उसके प्रियतम प्राणाराम ।*
*जग उठती उनके मन ‘रस-आस्वादन’ की लालसा ललाम।।*
*रसमय, रसिक, रससुधा-सागर स्वयं नित्य जो हैं रसराज।*
*वे अतृप्त नित करते उस रस का आस्वादन, तज सब लाज।।*
*इसीलिये वे राधा-गोपीजन के रहते नित्य अधीन ।*
*ऋण न चुका सकते वे उनका, नित्य मानते निजको दीन ।।*
*राधा इधर मानती निजको नित्य प्रेमधन की कंगाल ।*
*सदा सकुचती रहती, निज प्रति लख प्रियतम का भाव रसाल ।।*
*इस पवित्रतम प्रेमराज्य का रख मन में आदर्श महान ।*
*मानव मात्र त्यागपथ पर चल भजें नित्य रसनिधि भगवान् ।।*
*राधा-गोपी-प्रेम मधुर पावन का यह संदेश उदार ।*
*दुर्लभ जो अति मधुर-सुधा-भगवद् रस का शुचि पारावार ।।*
*मानव-जीवन का हो यह, बस, एकमात्र शुभ लक्ष्य पवित्र ।*
*शुद्ध प्रेम-रस-सागर में निमग्न रहना संतत सर्वत्र ।।*
*राधाष्टमी-महोत्सव का है केवल यही लाभ अति श्रेष्ठ ।*
*एकमात्र श्रीराधामाधव बन जायें जीवन के प्रेष्ठ ।।*

*गीता - वाटिका ,गोरखपुर में परम पूज्य  श्रीभाईजी की समाधि की अभी की दिव्य परिक्रमा...... कृष्ण गोविंद गोविंद, गोपाल नंदल...
27/09/2026

*गीता - वाटिका ,गोरखपुर में परम पूज्य श्रीभाईजी की समाधि की अभी की दिव्य परिक्रमा...... कृष्ण गोविंद गोविंद, गोपाल नंदलाल, कृष्ण गोविंद गोविंद, गोपाल नंदलाल.......परम भागवत पद रत्नाकर ग्रंथ, पद संख्या 1172 🌹जय जय श्रीराधे 🌹🙏🌹*

प्रभुसे प्यारा है न्यारा है जैसा जो कुछ भी सम्बन्ध।
काट दिये हैं उसने मेरे, यहाँ-वहाँके सारे बन्ध॥

रहते मेरे साथ निरन्तर, प्रभु क्षण दूर नहीं होते।
अनुभव सदा कराते अपना हर स्थितिमें जगते-सोते॥

रहूँ कहीं भी, कैसे भी, वे रहते नित्य पास मेरे।
रहते नित भीतर-बाहरसे चारों ओर मुझे घेरे॥

वे मेरे कैसे अपने हैं, इसे बताऊँ मैं कैसे।
अनुभव होता है, पर नहीं बता सकता गूँगा जैसे॥

*श्रीराधा रानी के महल में, मंगला विश्राम से पूर्व, गोपियों का आज का सुंदर भाव ।  जय जय श्रीराधे 🌹🙏🌹*🌹पीले पीले कपड़ों मे...
27/09/2026

*श्रीराधा रानी के महल में, मंगला विश्राम से पूर्व, गोपियों का आज का सुंदर भाव । जय जय श्रीराधे 🌹🙏🌹*

🌹पीले पीले कपड़ों में तू दिखे, तू दिखे कान्हा तू दिखे।

🌹काली रात तूने जन्म लिया है, *चंदा की चांदनी में तू दिखे, तू दिखे कान्हा तू दिखे।*

🌹वृंदावन चले अइयो मेरे कान्हा, रास रचाता तू दिखे
तू दीखे कान्हा तू दीखे, रास रचाता तू दिखे

🌹गोकुल में चले अइयो मेरे कान्हा, माखन चुराता तू दिखे
तू दीखे कान्हा तू दीखे, माखन चुराता तू दिखे

🌹यमुना तट चले अइयो मेरे कान्हा, चीर चुराता तू दिखे
तू दीखे कान्हा तू दीखे, चीर चुराता तू दिखे।

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