Ashok Vatika Research Centre

Ashok Vatika Research Centre Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Ashok Vatika Research Centre, Kotra, Bhopal.

आपको इस पेज पर झाड़ीदार, लताओं वाले और खूबसूरत पेड़ो के बारे में। फल, फूल और सजावटी पौधों के बारे में, बोनसाई पौधों के बारे में, एवं उनपर किए अनुप्रयोगों के बारे में, तथा उनके रख रखाव से संबंधित जानकारी, फोटो और वीडियो के द्वारा आप तक पहुंचाने का माध्यम🙏

आज मैं अपने पास की कॉलोनी में किसी काम से गया था, और आदत के मुताबिक लगे आस पास के पेड़ पौधों को देखते चला जा रहा था, तभी...
24/08/2026

आज मैं अपने पास की कॉलोनी में किसी काम से गया था, और आदत के मुताबिक लगे आस पास के पेड़ पौधों को देखते चला जा रहा था, तभी यकायक मुझे एक पेड़ दिखा जिसपर ढेर सारे फल लगे हुए थे। सूखे हुए, गुच्छे में लटके हुए थे। मै ठहर गया। रुका और ध्यान से उस पेड़ को देखने लगा। तब मुझे इस पौधे की पहचान हुई। इसके खूबसूरत पत्तों को देखते ही मै अति प्रसन्न हो गया जैसे मुझे कोई खजाना मिल गया हो। पहली बार था जब मैने इसका पेड़ देखा था। इसकी पहचान का कई कारण था मेरे पास। एक तो मैं ढूंढ कर इस पौधे को अपने गार्डन में लाया था। मेरे पास इसके पौधे पहले से भी मौजूद थे। खैर अगर मुझे इसकी पहचान नहीं भी होती तो मैं इसकी पहचान करता क्योंकि मुझे पौधों की पहचान करना, उनके बारे में जानने में बहुत ज्यादा रुचि है।

आप तो जानते ही है कि मुझे पेड़ पौधों का कितना शौक है और मैं बोनसाई तैयार करता रहता हूं। इसी क्रम में मेरे पास बहुत सारे ऐसे पौधे है जिन्हें लोग जंगली पौधों की श्रेणी में रखते है और उन्हीं पौधों को कुछ लोग बेशकीमती बताते हैं। उन्हीं पौधों की श्रृंखला में यह भी पौधा आता है।

दोस्तों इसका नाम पारस पीपल है। आप सोच रहे होंगे कि पीपल के बीज तो अंजीर जैसे बारीक दाना होता है, लेकिन दोस्तों यह उस पीपल जैसा होता ही नहीं है, यह उस पीपल की प्रजाति का भी नहीं है, इसके पत्ते पीपल जैसे होते है बस यह फ़ाइकस की प्रजाति का नहीं है। इसका वैज्ञानिक नाम Thespesia populnea है। दोस्तों यह एक उपयोगी और औषधीय वृक्ष है। आयुर्वेद में इसकी छाल, पत्ते, फूल और बीजों का उपयोग त्वचा रोग, दाद-खाज-खुजली, सूजन, पेट दर्द और घावों को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा, यह वृक्ष धार्मिक कार्यों, पर्यावरण को हरा-भरा रखने और छाया के लिए भी लगाया जाता है।

मैने उस पेड़ के नीचे रखे ईंटों के लॉट पर चढ़कर ढेर सारे इसके सीडपॉड को तोड़ लिया और जब इसे तोड़ा तो मुझे ये खूबसूरत बीज दिखे। मैं इसे अपने गार्डन में बो दिया हूं। इसको उग जाने के बाद उसकी भी फोटो और वीडियो इस पेज पर पब्लिश करूंगा। आप इस पेज को फॉलो कर साथ में बने रहे।

दोस्तों आपके यहां इस पौधे को किस नाम से जाना जाता है यह भी बताएं। क्या आपने अपने गार्डन, बाग, बगीचे में इस पौधे को लगाया है? इसकी और कोई विशेष जानकारी यदि आपको मालूम हो तो हमारे साथ जरूर साझा करें। हमारे वीवर्स को आपके द्वारा दी गई जानकारी उनके ज्ञान में वृद्धि करेगी। पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे लाइक एवं शेयर करें जिससे यह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके। पोस्ट को इतने ध्यान से पढ़ने के लिए आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

24/08/2026

🌿 A Bonsai That Feels Like Meditation 🧘‍♂️
This beautiful Peepal Tree Bonsai (Ficus religiosa) is more than just a piece of living art. 🌱✨ Beneath its graceful canopy sits Lord Buddha in deep meditation, creating a peaceful connection between nature, patience, and inner calm. 🪷

In this video, I’m defoliating the bonsai to reveal its beautiful trunk and branch structure, while also demonstrating soft pruning—a simple technique that encourages new growth and helps develop more branches, making the bonsai fuller and more refined over time.

Every cut has a purpose. Every new branch tells a story. 🌿

Nature • Art • Patience • Peace 🧘‍♂️🌳

दोस्तों इस तस्वीर को ध्यान से देख लीजिये। आज इसके जो फायदे बताऊंगा तो आप आश्चर्य चकित हो जायेंगे कि आपने अभी तक इसका प्र...
22/08/2026

दोस्तों इस तस्वीर को ध्यान से देख लीजिये। आज इसके जो फायदे बताऊंगा तो आप आश्चर्य चकित हो जायेंगे कि आपने अभी तक इसका प्रयोग करना शुरू क्यों नहीं किया। पहले इसके बारे में थोड़ी बात कर लेते हैं।

दोस्तों यह वह फसल है जिसने हमारे बुजुर्गो को ताकतवर बना कर रखा। कड़ी से कड़ी मेहनत के बाद भी उनके मुँह से आह नहीं सुना मैंने, यह सब उस दौर की फसलों और खान पान के कारण था। हमने आधुनिकता में अपनी ताकत अपनी पारम्परिक खेती, खान पान, यहाँ तक की भाषा की ताकत को खो दिया। अपनी गरिमा, अपनी पहचान को मिट जाने दिया। और उसका परिणाम हमारे समक्ष खड़ा है। बिमारियों के अम्बर तले दबा हर शख्स है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक। आज कल एक अदद खांसी भी हिला देती शरीर को। 30 से 35 की उम्र तक तो पहुंचते पहुंचते बुढ़ापा महसूस होने लग रहा है। और पहले के लोग १०० साल तक तंदरुस्त बने रहते थे। कारण सिर्फ एक है , जीवन शैली।

हमें अपनी उन धरोहरों को संरक्षित करने की जरूरत है। अभी नहीं तो कभी नहीं। हमें उन अनाजों को खेती पुनः प्रारम्भ करनी पड़ेगी जिन्हे छोड़ दिया। इन पर शोध होनी चाहिए। इनकी उन्नत किस्में तैयार होनी चाहिए। कम पानी में भी बेहतरीन उपजने वाली फसलें हैं ये। सरकारों को इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसानो को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां लानी चाहिए। हम विश्वगुरु की खोखली बातें ही करते रह जायेंगे जब तक की हम अपनी स्वदेशी फसलों को विश्वपटल पर नहीं लाते। पुरे विश्व में मिल्लेट्स अर्थात मोटे अनाजों की जो भारी मांग है जब हम उसको पूरा करने में सक्षम होने लगेंगे तब यह सपना पूर्ण होना संभव होगा।

दोस्तों इस तस्वीर में दिखाई गयी फसल सांवा है। इसे Barnyard मिलेट के नाम से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Echinochloa Frumentacea कहा जाता है। यह मोटे अनाज (Millets) की श्रेणी में आने वाली एक पारम्परिक फसल है। इसके दानों से खिचड़ी, खीर, पुलाव बनायीं जाती है। जिसका प्रयोग हमारे घरो में ब्रत और उपवास के दौरान खाने के लिए किया जाता है। इससे आप नमकीन उपमा, पोहा, या गरमा गर्म दलिया बना कर नास्ते के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं। इसे स्थानीय भाषा में समां के चावल, भगर, या मोरधन भी कहा जाता है। इसे देश में अलग अलग जगहों पर उडालू, सांवा, कुथिरावली के नाम से भी जाना जाता है। आप इसका प्रयोग चावल की जगह कर सकते है।

मेरा निवेदन है की आप चावल को सांवा से रिप्लेस कर दें। जैसा की आप जानते ही हैं कि सफेद चावल खाने से वजन बढ़ना, ब्लड शुगर का तेजी से बढ़ना, और पाचन से जुड़ी समस्याएं होती हैं। इसमें कार्बोहाइड्रेट ज्यादा और फाइबर कम होता है, जिससे मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा रहता है। तो चावल की जगह आप सांवा का प्रयोग कीजिये।

कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण यह शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है , जिससे यह शुगर के मरीज अर्थात मधुमेह के रोगियों के लिए सुरक्षित है। इसमें भरपूर मात्रा में उपस्थित फाइबर के कारण यह आसानी से पचने वाला है जिससे कब्ज नहीं होती। शरीर में कब्ज बिमारियों का घर होता हैं, सब बीमारियां अपच के कारण ही पनपती हैं। पेट सफा हर रोग दफा। इसे खाने से भूख जल्दी नहीं लगती, लम्बे समय तक आपका पेट भरा हुआ महसूस होता होता है, इसकारण से आप बार बार खाना नहीं खाते है और आपका वजन भी नियंत्रण में रहता है।

सीलिएक रोग या ग्लूटन से एलर्जी वाले लोगो के लिए भी यह सुरक्षित है वे भी खा सकते है। इसमें आयरन और कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है, जिससे आपकी हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। आयरन को पर्याप्तता के कारण आपके शरीर में खून की कमी नहीं होने देता, जिससे आपकी शरीर हमेशा ऊर्जा से भरपूर रहती है और आपके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से बढ़ती है जिससे आप जल्दी बीमार नहीं होते और इस कारण आप हमेशा तंदरुस्त और जवान बने रहते हैं।

तो दोस्तों क्या आप पहले से इस फसल के बारे में जानते हैं ? यदि हाँ तो इसके बारे में और भी जानकारिया हमारे साथ साझा करें। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता हैं वह भी बताएं। यह पोस्ट आपको कैसा लगा जरूर बताएं। यह पोस्ट यदि आपको उपयोगी लगा हो तो लाइक एवं शेयर जरूर करें जिससे देश के हर नागरिक तक पहुंच सके। आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

22/08/2026

This is the Update of Peepal Bonsai, Watch it's Beauty. I will showcase it's structure in the second Part. Follow for the upcoming videos.

दोस्तों यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, एक पूरी जिंदगी है। यादों का पुलिंदा है। जिस जिंदगी को हमने कभी जिया था। यह उस दौर की तस...
21/08/2026

दोस्तों यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, एक पूरी जिंदगी है। यादों का पुलिंदा है। जिस जिंदगी को हमने कभी जिया था। यह उस दौर की तस्वीर है। जब ट्यूबवेल नहीं थे, बिजली नहीं थी, मोबाइल नहीं था। बिजली आती थी तो मात्र तीन चार घंटे के लिए। उस दौर के छोटे किसान किन हालातों में जीवन यापन करते थे वह सिर्फ वही समझ सकते है और महसूस कर सकते हैं जो उस जिंदगी को जिए है।

मैं इस पोस्ट में यह बिल्कुल भी नहीं कहने का प्रयास कर रहा हूं कि उस दौर में लोग तकलीफ में जीवन यापन करते थे। नहीं! बिल्कुल भी नहीं। बल्कि उस दौर को मैं सुनहरा दौर कहता हूं। जहां सब खुश रहते थे। ज्यादा तनाव नहीं था। मुफ़लिशी थी लेकिन कोई तनाव नहीं। बड़े सपने नहीं देखा करते थे, बस खुशी आनंद में जीवन यापन किया करते थे।

उसी दौर की यह तस्वीर है जिसमें एक किसान अपने खेतों की सिंचाई के लिए ढेंकली चला रहा है। ढेंकली एक व्यवस्था थी उस दौर की जिसमें इंसान की मेहनत से सिंचाई होता था। कुएं उस दौर में जीवित थे। उन्हीं कुवों से हम पानी पिया करते थे। क्रिस्टल क्लियर पानी। कोई आर ओ की जरूरत नहीं थी। एक खर पतवार कुवें में नहीं मिलता था। दादाजी कुंवे के बीच में बांस के बने हेंगा पर खड़े होकर ढेंकली को खींच कर पानी निकालते। ठीक यह व्यवस्था बाल्टी से पानी खींचने जैसी ही थी। लेकिन बाल्टी से बहुत बड़ी ढेंकली होती थी। मेरे हिसाब से एक बार 30 लीटर से ज्यादा पानी भर लेती थी।और इसारे से ऊपर खींचने पर इस सिस्टम में पीछे बंधा हुआ भार ढेंकली को आसानी से खींच कर ऊपर ला देता था फिर उस पानी को नाली में गिरा दिया जाता था।

आप सोचिए कि दो चार दस बीस ढेंकली पानी निकालने की बात नहीं हो रही है। यहां घंटों अनगिनत ढेंकली पानी निकालने की बात हो रही है जिससे एक निश्चित क्षेत्रफल का खेत की सिंचाई संपन्न करनी होती थी। फसल सुख न जाए यह चिंता रहती थी। दूसरा यह भी था कि एक ही कुंवे पर कई लोग आश्रित हुआ करते थे। कई लोगों के खेत की सिंचाई होनी होती थी। इसलिए एक इंसान लगातार घंटों मशीन की तरह पानी निकलता था। लेकिन जो लोग थे इतने मजबूत कि मैने उन्हें कभी हांफते हुए नहीं देखा। वो सहजता से बिना किसी शिकायत करते रहते थे।

आप यह भी सोच सकते हैं कि पानी सुख जाता होगा कुवे का। बिल्कुल भी नहीं। पानी का स्तर जरूर कम होता था लेकिन सुबह फिर से उसी स्तर पर पानी भर जाता था। नयी पीढ़ी सोच रही होगी कि वे कुएं गए कहां तो इसका जवाब भी उसी पीढ़ी को देना होगा जिसने अपने कुओं को भर दिया कचड़ो से, जो जीवन दायी थे। जिसके बदौलत पूरा कुनबा जीवित था। जब हम उनकी कदर नहीं कर पाए तो फिर आपको तकलीफ क्यों हो रही है जब आज की पीढ़ी अपने बुजुर्गों का सम्मान नहीं कर रही। छोड़ आ रही वृद्धाश्रम में। कुओं के साथ ही आपने संस्कारों की तिलांजलि दे दी। उन संस्कारों की जिसमें सिद्धांतों के साथ जीना सिखाया जाता था। लेकिन अब सिर्फ जीना। बिना सिद्धांत जीवन हम सभी जी रहे ही हैं।

मैने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि यह दिन एक दिन सपना हो जाएगा । यह पूरी तस्वीर आंखों से ओझल हो जाएगी। यह कुंवा, यह ढेंकली, और मेरे दादा जी 😢 सिर्फ यादें रह जाएंगी। कभी चाहकर भी उस समय में लौट नहीं सकता। कभी आपने महसूस किया है इस मजबूरी को? क्या वह दौर आपको सपने जैसा नहीं लगता? लगता नहीं कि वह कोई और युग था और हम किसी अन्य युग में जी रहे हैं? क्या आजकल की पीढ़ी उस दौर की कल्पना भी कर सकेगी?

सबके पास इतना काम होने के बाद भी शाम और सुबह में सभी टोले मुहल्ले के लोग एक साथ बैठ कर कथा कहानियों कहते। हम सुनते, सीखते। रातें छत पर जुगनुओं को निहारती, तारों को गिनती। सत्तहवा और तीन डांडियावा तारों का समूह होता था। जिनको देखकर हम रात के प्रहर का आंकलन कर सकते थे। उसी आधार पर हम तड़के सुबह उठ जाते थे।

यदि इस पोस्ट को पढ़कर आप भी उस युग में पहुंच गए हैं तो आप भी अपनी कहानी एवं भावनाएं कमेंट के माध्यम से हमारे साथ साझा कर सकते हैं। पोस्ट को लाइक एवं शेयर कर अन्य स्वजनों तक पहुंचाएं।आप सभी प्रिय मित्रों को बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

#ढेंकली

20/08/2026

Watch this beautiful Bonsai Art! 🌿 After a long time, I’m finally sharing an update on this bonsai. Look how beautifully it has developed! 😍 Watch the full video to see its amazing transformation.

दोस्तों क्या ये फल और फूल जाने पहचाने लग रहे हैं? यदि नहीं तो आप निश्चित ही नयी पीढ़ी के हैं और आप खेत और खलिहान से बहुत ...
19/08/2026

दोस्तों क्या ये फल और फूल जाने पहचाने लग रहे हैं? यदि नहीं तो आप निश्चित ही नयी पीढ़ी के हैं और आप खेत और खलिहान से बहुत दूर हैं। वे सभी लोग इस पौधे से परिचित होंगे जो गाँवो में रहते है, खेती बाड़ी से जुड़े हुए हैं या फिर जिनकी जड़ें गाँवो से जुडी है और खेती बाड़ी किये हुए हैं। हमारे यहाँ इसकी खेती होती है। कभी कभी पुरे खेत में यही फसल लगा दी जाती थी , और कभी कभी गेंहू और सरसो के खेतो के किनारे किनारे एक दो फ़ीट के एरिया में इसे बोया जाता था, जिसे धारी कहा जाता है। धारी में अक्सर सरसो या फिर इसके बीज बोये जाते हैं।

दोस्तों यह रवि की फसल है, जनवरी के अंत तक अर्थात बसंत ऋतू में इसमें फूल खिल जाते हैं। नीले नीले खूबसूरत फूलों से खेत की सुंदरता अत्यधिक बढ़ जाती है। लोकलुभावन और मन भावन दृश्य हर किसी को खींच लेते हैं और अक्सर मुझे वे खेत आज भी पुकारते हैं लेकिन शहर की भागदौड़ में इतना उलझ गए हैं की उस खूबसूरत जिंदगी को जीना संभव नहीं लगता।

होली के समय तक इसमें फल लग चुके होते हैं। छोटे छोटे गदा जैसे। पकने भी लगते है उस समय तक। मैंने देखा है लोग होलिका दहन में उस समय की प्रमुख फसलें जैसे गेंहू, चना, अलसी, सरसो को होलिका की जलती आग में समर्पित करते हैं। इसके पीछे नयी फसल आने की खुशियां होती है , खैर कुछ लोग बस परम्परा अनुसार करते हैं। और कुछ लोग ग्रह दोष दूर करने के टोटके के रूप में भी जलाते हैं। आपको इस परंपरा के बारे जानकारी हो तो हमारे साथ जरूर साझा करें।

दोस्तों ठंढ के मौषम में इसे आग पर भूनकर पीस कर इसके लड्डू बनते हैं, जिन्हे हमारे यहाँ तीसी का कसार और तिसौरा कहा जाता है। मुझे बहुत पसंद है।

दोस्तों इसका नाम अलसी है, इसे अंग्रेजी में फ्लेक्स सीड्स कहा जाता है। हमारे यहाँ तीसी कहा जाता है। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है कमेंट के माध्यम से जरूर बताये।

दोस्तों यह बहुत ही फायदेमंद अनाज है। इसमें अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) मौजूद होता है जिसके कारण यह हृदय के लिए अच्छा होता है। इसमें उच्च फाइबर होता है जो पाचन में सहायता करता है और कब्ज से राहत दिलाता है। अर्थात पेट सफा तो हर रोग दफा। अधिकतर रोगों का मुख्य कारण अपच ही है। खराब कोलेस्ट्रॉल और रक्तचाप को भी कम करने में मदद करता है। इसके व्यंजन खाने से आपको जल्दी भूख नहीं लगती इस कारण जो अपना वजन कम करना चाहते है या वजन नियंत्रित करना चाहते है उन्हें इसके व्यंजन जरूर खाना चाहिए। आप इसके सीड्स को भून कर रोज सुबह एक चम्मच नास्ते के रूप में जरूर खाएं। आपकी बहुत सारी बिमारियों का निदान यह कर सकता है।

दोस्तों इसका तेल भी बनाया जाता है और उसे भी खाया जाता है। ध्यान रखें जिस तेल को बिना गर्म करें निकला जाता है उसी को खाया जा सकता है। सलाद पर डाल कर लोग खाते हैं। इसके तेल में Omega-3 Fatty एसिड होता है जो ह्रदय के स्वस्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसके प्रयोग से त्वचा में चमक आती है और बाल मजबूत होते हैं। प्रतिदिन पांच से दस एम् एल ही यूज़ करें।

जो तेल गर्म कर के बनाया जाता है उसे सिर्फ औद्योगिक कामो में ही प्रयोग किया जाता है जैसे लकड़ी के पॉलिश में यूज़ किया जाता है, क्यूंकि यह लकड़ी को ख़राब होने से बचाता है। पेंट और वर्निश बनाने में भी प्रयोग होता है, क्यूंकि यह पेंट और वर्निश को जल्दी सूखने में मदद करता है।

अलसी के तेल को ठंढे स्थान जैसे फ्रीज में रखा जाता है और काले रंग की बोतल में अँधेरे में रखा जाता है नहीं तो इसका तेल हवा और रोशनी के संपर्क में आने से ख़राब हो जाता है।

तो दोस्तों आज का यह पोस्ट आपको कैसा लगा कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं। इस पोस्ट को लाइक एवं शेयर जरूर करें, जिससे की ज्यादा से ज्यादा लोगो तक यह पहुंच पाएं। ऐसे ही उपयोगी पोस्ट और वीडियोस के देखने के लिए इस पेज को जरूर फॉलो करें। आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

18/08/2026

Jatropha Podagrika! बुद्धा बेली प्लांट के नाम से भी जाना जाता है, प्रूनिंग के बाद इसकी खूबसूरती देखिए। पौधों की बराबर देख रेख से उस पर लगने वाली बीमारियों को समय रहते पहचान कर इलाज कर पौधे को बचाया जा सकता है। पूरी वीडियो जरूर देखें।

अधिकतर लोग बिना गूगल किए इसका सही नाम नहीं बता सकते। बता सकते है सिर्फ वही जिनकी जड़े गांवों से जुडी है और 90's या फिर उ...
18/08/2026

अधिकतर लोग बिना गूगल किए इसका सही नाम नहीं बता सकते। बता सकते है सिर्फ वही जिनकी जड़े गांवों से जुडी है और 90's या फिर उसके पहले के दशकों में जो गांव में रहे हैं।

दोस्तों इसकी खेती बहुतायत से ग्रामीण अंचलों में होती थी, फिर धीरे धीरे आधुनिकता की आंधी में गेहूं और चावल ने उन सभी अनाजों को हमारी थाली से अलग कर दिया, जिन्होंने हमें हमेशा स्वस्थ रखा था। आज का आटा, मैदा, चावल और अन्य अनाज जब पाचन में समस्या करते हैं तो हमें डॉक्टर दलिया खाने की सलाह देते हैं। और दलिया बनती है उन्हीं अनाजों से जिनको हमने मोटे अनाजों की श्रेणी में रख दिया है। ये हमारी जीभ को खुरदुरे लगने लगे थे, अर्थात मुलायम नहीं लगते थे। इसलिए हमने इनको उगाना बंद कर दिया। लेकिन हमारा खान पान इतना दूषित हो गया कि फिर से उन्हीं अनाजों पर लौटना पड़ रहा है जिनसे हम कभी दूर भागते थे।

इस मोटे अनाजों की श्रेणी में रखा गया है। जिनमें जौ, बाजरा, लेतरी, साँवा, चीना, मड़ुआ, ज्वार और कोदो जैसे सुपाच्य और पौष्टिक अनाज शामिल हैं। लेकिन आधुनिकता के दौर में गारंटी की इक्छा न करें वाली लाइन तो आपने पढ़ा ही होगा। हम विलासिता के चक्कर में जीवन से ही दूर हो गए, बहुत दूर। अब लगता है वहां लौटना मुश्किल है।

इन्हीं अनाजों में से एक है जिसकी तस्वीर मैने साझा की है। इसको हमारे यहां मड़ूआ कहा जाता है, और हिंदी में रागी। आपके यहां इसे किस नाम से जाना जाता है, कमेंट में जरूर बताएं।

इसकी खपत न होने के कारण, किसानों ने बुआई बंद कर दी, और हालात ये हो गए कि जो भी फैंसी अनाज है जैसे गेहूं और चावल! उनकी औसत कीमत 30 रुपए से 50 रुपए किलो तक ही है जबकि रागी की क़ीमत 75 रुपए से 100 रुपए तक कि औसत कीमत पर बिक रहा है।

अब इसका आधुनिक नाम से वापसी हुई है - "मिलेट"। अब हम बड़े शौक से "मिलेट" से बने व्यंजनों को ढूंढ रहे हैं। बिस्किट भी "मिलेट" वाला चाहिए। और "मिलेट" के समान बहुत महंगे तो बिकते ही है।

दोस्तों इसमें उच्च कैल्शियम पाया जाता है जो कि दूध और चावल की तुलना में कही ज्यादा होता है। जिससे आपकी हड्डियां मजबूत बनती है। फाइबर से भरपूर होता है, जिससे आपका शुगर नियंत्रण में रहता है और वजन भी नहीं बढ़ने देता। खाना आसानी से पच जाता है जिससे गैस नहीं बनती और पेट से जुडी समस्यां नहीं होती। अधिकतर बीमारियों का मुख्य जड़ अपच ही है, और जब अपच ही नहीं होगा, तो बीमारियों की कहानी ही खत्म समझिए। इसमें ग्लूटन नहीं पाया जाता, जिन लोगो को ग्लूटिन एलर्जी करता है वो भी इसे खा सकते हैं।

दोस्तों इसके भारत भर में बहुत सारे व्यंजन बनते हैं। मुझे तो इसकी रोटी जैसी मोटी लिट्टी बहुत पसंद है और मैं खाता रहता हूं। क्या आप अभी भी रागी का स्वाद ले पा रहे हैं कमेंट में जरूर बताएं।

मैने अपने गांव में, या फिर जहां हूं वहां इसकी खेती होते नहीं देख पा रहा हूं। क्या आपके यहां अभी भी इसकी खेती होती है जरूर बताएं। आज का यह पोस्ट यदि आपको उपयोगी लगा हो तो इस पेज को फॉलो जरूर करें। लाईक, शेयर और कमेंट जरूर करें जिससे से यह पोस्ट ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। आप सभी प्रिय मित्रों को बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

17/08/2026

कबाड़ से जुगाड़ की अद्भुत वीडियो देखिए दोस्तों! मेरी पुत्री ने यह आइडिया दिया कि इसे प्लांटर बनाते हैं, क्योंकि बच्चों की यह बाइक घर में इधर उधर पड़ी रहती थी। मुझे उसका सुझाव बहुत पसंद आया और हम तुरंत उस काम में लग गए। वीडियो में देखिए कितना अच्छा आईडिया है ! आप भी ट्राई करें। अगले भाग को देखने के लिए इस पेज को फॉलो करें।

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